शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

खुले घूमते बाज

है कैसा अंधेर ये, कैसा जंगल राज.
पंछी थर-थर कांपते, खुले घूमते बाज.
खुले घूमते बाज जहाँ तक नजर पड़ी है.
सोने की चिड़िया पर इनकी आंख गडी है.
झपट चोंच में भर लेने को कमर कसी है.
चिड़िया है अनजान बात बस इतनी सी है.

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बहुत ही बढ़िया कुण्डलिया लिखी है!
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    इसकी चर्चा तो चर्चा मंच पर भी है-
    http://charchamanch.blogspot.com/2010/08/238.html

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