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रविवार, 1 अगस्त 2010

अंधी पीसे कुत्ते खायं

बेखटके चौके तक जायं
अंधी पीसे कुत्ते खायं.

इनसे भूखी आदम जात
सोलह आने सच्ची बात
कितने पढ़े ज्ञान विज्ञान
मैल  न धो पाया इन्सान
ये साबुन से रोज नहायं
अंधी पीसे कुत्ते खायं.

दिल्ली रह लें या भोपाल
वही समझ वैसा ही हाल
फिरते गज भर जीभ निकाल
जैसे ही पा जाएँ माल
लड़ें-भिड़ें भोंकें गुर्रायं
अंधी पीसे कुत्ते खायं.

इनकी आदत पर दे ध्यान
जीवन के सच को पहचान
मेहनत के दिन बीते यार
तू भी छीन झपट्टा मार
चोर उचक्के मौज मनायं
अंधी पीसे कुत्ते खायं.

झूठ कहें कहलायं  महान
सच्चे की सांसत में जान
कहीं  सिसकती सूनी शाम
हंस कर कहीं छलकते जाम
 लुच्चे मोहन भोग चबायं
अंधी पीसे कुत्ते खायं.


रखवाली था जिनका काम
लालच के सब हुए गुलाम
कैसा उल्टा चला जहान
भीतर राज कर रहे श्वान
बाहर शेर खड़े ललचायं
अंधी पीसे कुत्ते खायं.